भारत की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो भीड़ में नहीं चलते, बल्कि भीड़ को दिशा देते हैं। चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ ऐसा ही एक नाम है।
एक ऐसा युवा, जिसने भीम आर्मी के ज़रिए दलित समाज को नई आवाज़ दी और फिर अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़कर ब्राह्मणवाद के खिलाफ विचारधारात्मक युद्ध छेड़ दिया।
इस लेख में हम समझेंगे — चंद्रशेखर का सफर कैसे शुरू हुआ, ‘रावण’ नाम क्यों अपनाया और कैसे वह आज नई पीढ़ी के संघर्ष का चेहरा बन चुके हैं।
शुरुआत — सहारनपुर से उठी एक बुलंद आवाज़
चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के घड़कौली गांव में एक दलित परिवार में हुआ। एक वकील बनने का सपना देखने वाला यह युवक जल्दी ही समझ गया कि सिर्फ कानून की डिग्री नहीं, समाज को जगाने के लिए हिम्मत और आंदोलन की ज़रूरत है।
2015 में उन्होंने बनाई भीम आर्मी भारत एकता मिशन, जो आज ‘भीम आर्मी’ के नाम से जानी जाती है।
इस संगठन का मकसद था —
शिक्षा के ज़रिए समाज को जगाना और अत्याचार के खिलाफ लड़ना।
सहारनपुर दंगे और पहली गिरफ्तारी
2017 में सहारनपुर में जातीय हिंसा हुई, जब ठाकुर समुदाय द्वारा दलितों पर हमला किया गया।
चंद्रशेखर ने खुलकर विरोध किया और उनकी आवाज़ पूरे देश तक पहुँची।
वह पहली बार पुलिस के निशाने पर आए, लेकिन उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर फैल गया।
भीम आर्मी की ये छवि बन गई —ये सिर्फ नारे नहीं लगाते, ज़मीन पर लड़ते हैं।
क्यों जोड़ा अपने नाम के साथ ‘रावण’?
रावण’ नाम को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा हुई जब चंद्रशेखर ने खुद को चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ कहना शुरू किया।
अब सवाल उठता है — क्यों?
उनकी सोच साफ थी:
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रावण एक विद्वान ब्राह्मण था, जिसे ‘राक्षस’ बनाकर पेश किया गया क्योंकि उसने ब्राह्मणवादी सत्ता को चुनौती दी।
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दलित समुदाय में रावण को एक विरोध के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
चंद्रशेखर ने कहा:जो नाम सदियों से दमन के लिए इस्तेमाल किया गया, मैं उसे अपनी ताकत बना रहा हूँ।
उनके इस फैसले ने उन्हें दलित युवाओं में क्रांतिकारी नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
शिक्षा, संगठन और सोशल मीडिया की तिकड़ी
भीम आर्मी केवल एक प्रदर्शनकारी समूह नहीं है। यह हजारों ‘भीम पाठशालाओं’ के ज़रिए दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का काम करती है।
चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया का भी जबरदस्त उपयोग किया:
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Facebook और Twitter पर लाखों फॉलोअर्स
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Instagram पर युवा जुड़ते हैं उनके विचारों से
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YouTube पर भाषण वायरल होते हैं
उनका संदेश साफ होता है:जय भीम का नारा, संविधान का सहारा।
राजनीति में प्रवेश — आज़ाद समाज पार्टी
2020 में चंद्रशेखर ने बनाई आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)।
उनकी राजनीति मुद्दों पर आधारित है:
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शिक्षा
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आरक्षण
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महिलाओं की सुरक्षा
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अल्पसंख्यकों के अधिकार
वो पारंपरिक दलित राजनीति से अलग एक जागरूक, शिक्षित और साहसी नेता की छवि लेकर सामने आए।
2022 यूपी चुनाव और 2027 की तैयारी
2022 में चंद्रशेखर ने कई सीटों पर चुनाव लड़ा।
हालाँकि बड़ी जीत नहीं मिली, लेकिन उन्होंने बताया कि वो राजनीतिक विकल्प बनने आए हैं, वोट काटने नहीं।
अब 2027 की तैयारी चल रही है —
संगठन, जनसंपर्क और सामाजिक आंदोलन के ज़रिए वो वोटर के दिल में उतरना चाहते हैं।
‘रावण’ नाम की ताकत — विरोध से प्रतीक तक
‘रावण’ नाम पर उन्हें बहुत विरोध झेलना पड़ा:
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मीडिया में बदनाम किया गया
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हिंदू संगठनों ने विरोध किया
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पुलिस ने कई बार गिरफ़्तार किया
लेकिन इसके बावजूद, उनके समर्थकों के लिए वो “हमारा रावण” बन चुके हैं।
अब ‘रावण’ एक नाम नहीं, बल्कि दबे-कुचले वर्ग की आवाज़ बन चुका है।
भीमराव अंबेडकर से प्रेरणा
चंद्रशेखर हर मंच पर कहते हैं:हम अंबेडकर की विचारधारा को जमीन पर लागू करना चाहते हैं।
उनकी विचारधारा 3 आधारों पर टिकी है:
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समानता
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शिक्षा
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संविधान
उनकी लड़ाई राम बनाम रावण की नहीं, बल्कि सत्ता बनाम न्याय की है।
