उत्तर प्रदेश (UP) की राजनीति में दलित वोट बैंक पर कब्ज़ा करना हमेशा से एक महत्वपूर्ण मैदान रहा है। दशकों तक इस क्षेत्र में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी (BSP) का एकाधिकार रहा। लेकिन अब सामने आया है एक नया चेहरा—चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’, जिन्होंने हाल के चुनावों में इस सत्ता समीकरण को चुनौती दी है।
इस ब्लॉग में हम विस्तृत रूप से विश्लेषण करेंगे—क्या मायावती अभी भी इस वोट बैंक की रानी हैं, या चंद्रशेखर आज़ाद ने इस क्षेत्र में बड़ा दावा जमा लिया है? अंत तक बने रहिए।
-
-
मायावती का सुनहरी दौर और गिरावट (Mayawati’s Golden Era and Decline)
-
राजनीतिक उभार
1990 और 2000 के दशक में मायावती ने उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय का आत्म-सम्मान जागृत करते हुए दमदार राजनीति की थी। उन्होंने चार बार मुख्यमंत्री रहते हुए ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीति से ‘रॉंगबो कोएलिशन’ का निर्माण किया—जिसमें दलित, पिछड़े, ब्राह्मणों और मुसलमानों को शामिल किया गया
गिरावट की शुरुआत
लेकिन 2012 के बाद BSP का ग्राफ लगातार नीचे गिरा:2017 विधानसभा चुनाव में BSP के वोट शेयर में गिरावट आई—22% तक
2022 में बसपा केवल 12.9% वोट हासिल कर पाई और महज एक विधानसभा सीट जीती
CSDS की रिपोर्ट के मुताबिक, गैर-जाटव दलितों में BSP का समर्थन गिरकर 23% रह गया
कारण क्या हैं?
जमीनी कनेक्शन में कमी और सक्रियता घटना
दशकों से प्रतिष्ठित वोट बैंक—जाटव और गैर-जाटव—में बिखराव और BJP/SP की सक्रियता
-
-
चंद्रशेखर आज़ाद की उभरती लीडरशिप (Emergence of Chandrashekhar Azad)
-
आंदोलन से लोकसभा तक
चंद्रशेखर आज़ाद ने 2014-15 में भीम आर्मी की स्थापना की—दलित शिक्षा और सामाजिक न्याय को आधार बनाकर
। 2020 में उन्होंने आज़ाद समाज पार्टी (ASP) की नींव रखी और 2024 में नगीना लोकसभा सीट से भारी जीत दर्ज की
प्रतीक बनते एजेंडानगीना की सीट जहां 20% वोट दलितों (विशेषकर जाटव) का था—चंद्रशेखर ने 51% वोट शेयर हासिल किया, जबकि BSP मात्र 1.33% पर सीमित रही। उनका यह हमला स्पष्ट रूप से मायावती के वोट बैंक को चुनौती है।
युवा और अभिव्यक्तिमूलक नेतृत्व
चंद्रशेखर का स्टाइल—सड़क से जुड़े आंदोलन, सोशल मीडिया की पकड़, और आक्रामक भाषा—ने उन्हें युवाओं और फ्रेन्क सामाजिक कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय बना दिया
-
-
वोट बैंक टकराव: कौन कितना?
-
जाटव वोट
मायावती की ताकत जाटव वोट में केंद्रित रही, लेकिन चंद्रशेखर ने जानबूझकर इसी समूह को निशाना बनाया—कांशीराम की याद में नगीना से शुरुआत करते हुए
गैर-जाटव दलितों की सोच
CSDS के डेटा मुताबिक, गैर-जाटव दलित अब BSP से दूर हो रहे हैं—जो चंद्रशेखर की बढ़ती लोकप्रियता का संकेत है
मुसलमानों के सहारे
चंद्रशेखर ने दलित और मुस्लिम वोट को मोड़कर जीत दर्ज की, जबकि दलित-मुस्लिम गठजोड़ BSP के लिए अब तक सफल नहीं रहा है
-
-
वर्तमान राजनीतिक तस्वीर (Current Political Landscape)
-
BSP की स्थिति
2024 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के बाईपोल में BSP को एक भी सीट नहीं मिली—यह गिरावट मायावती के लिए चेतावनी जैसा है
Azad Samaj Party और चंद्रशेखर की सक्रियता
ASP अभी ग्रामीण इलाके और पंचायत चुनावों के जरिये अपनी पहुँच बढ़ाने की कोशिश में है; चंद्रशेखर ने सीधे मुकाबले की रणनीति अपनाई है और BSP पर हमला जारी है
गठजोड़ की संभावनाएँ
SP और ASP के बीच 2027 के चुनावों को लेकर गठबंधन की सम्भावनाएँ तलाशी जा रही हैं—लेकिन अभी तक कोई फाइनल निर्णय नहीं हुआ
निष्कर्ष: कौन कब्ज़ा कर रहा है?
मायावती अभी भी सम्मानित नेता (कुछ हद तक)
उनकी छवि और इतिहास डबल दलित नेतृत्व के प्रतीक रहे हैं। लेकिन वोट बैंक की तरह, कनेक्शन और संगठन में कमी उनकी कमजोरी बन गया है।
चंद्रशेखर आज़ाद का नया दावा
उन्होंने खुद को “पोस्ट-मायावती” नेता के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया है—युवा ऊर्जा, सोशल मीडिया और आंदोलन से जुड़े नेता के रूप में
वोट बैंक बंटवारा
अगर BSP और ASP अलग से लड़ते रहे, तो निश्चित रूप से वोट बैंक बंट जाएगा। SP के साथ समझौता होने पर यह तालमेल BJP के खिलाफ मजबूत विकल्प हो सकता है।
अंतिम विचार (Final Thought)
उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति नाटकीय रूप से बदल रही है। मायावती की एकल दिग्गजता गिर रही है, जबकि चंद्रशेखर आज़ाद नए विकल्प और उम्मीद का नाम बनकर उभर रहे हैं। आने वाले सालों में गठजोड़ या प्रतिद्वंद्विता के आधार पर यह लड़ाई दिशा तय करेगी। हर चुनाव इस लड़ाई को और सजीव बनाएगा।
