Monday, January 26, 2026

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क्यों चंद्रशेखर आज़ाद ने ‘रावण’ नाम चुना — जानिए इसका सामाजिक और राजनीतिक अर्थ

जब भी कोई “रावण” शब्द सुनता है, तो ज़्यादातर लोगों के मन में एक ही छवि बनती है — एक राक्षस, जो अहंकारी था, जिसने सीता का हरण किया और जिसे राम ने मारा। लेकिन जब एक युवा दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ता है, तो यह केवल एक नामकरण नहीं रह जाता — यह एक राजनीतिक और सामाजिक बयान बन जाता है।

तो सवाल ये है:
आख़िर चंद्रशेखर आज़ाद ने ‘रावण’ नाम क्यों चुना?
क्या यह सिर्फ़ समाज को चौंकाने के लिए था? या इसके पीछे एक गहरा संदेश छुपा है?

इस ब्लॉग में हम चंद्रशेखर के इस फैसले के पीछे की सोच, इतिहास, सामाजिक दृष्टिकोण और राजनीतिक रणनीति को समझने की कोशिश करेंगे।

शास्त्रों में राक्षस, दलितों में प्रतीक

जहाँ एक ओर हिंदू धर्मग्रंथों में रावण को बुराई का प्रतीक माना गया है, वहीं दूसरी ओर भारत के कुछ वर्ग, विशेष रूप से दलित और बहुजन समाज, रावण को एक शक्तिशाली ब्राह्मण-विरोधी योद्धा और विद्वान के रूप में देखते हैं।

रावण:

1.एक विद्वान ब्राह्मण था 2.शिव भक्त था,3.और उसे वेद-शास्त्रों का गहरा ज्ञान था।

परंतु वह ब्राह्मणिक व्यवस्था के खिलाफ खड़ा था — यही कारण है कि उसे दमनकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शिकार के रूप में भी देखा जाता है।

चंद्रशेखर की सोच — नाम से विरोध का प्रतीक बनाना

चंद्रशेखर आज़ाद रावण ने इस नाम को जानबूझकर अपनाया, ताकि वो एक राजनीतिक विद्रोह और सामाजिक प्रतिरोध का प्रतीक बन सकें।

उन्होंने खुद कहा है:

जिस समाज में रावण को राक्षस बताया गया, उसी समाज ने मेरी जाति के लोगों को सदियों तक कुचला है। मैं उसी रावण को अपने नाम से जोड़ता हूँ ताकि ब्राह्मणवाद को चुनौती दे सकूं।

यह एक तरह की विचारधारात्मक क्रांति है — जिसमें वह उस पात्र को अपनाते हैं जिसे ब्राह्मणिक व्यवस्था ने शत्रु बताया।

दलित आंदोलन में ‘रावण’ का प्रतीकवाद

भारत में दलित आंदोलन हमेशा से संविधान, अंबेडकरवाद और सामाजिक न्याय के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। लेकिन इस आंदोलन को अक्सर धार्मिक प्रतीकों और पौराणिक विरोधों की ज़रूरत भी पड़ी है।

‘रावण’ उस संघर्ष का चेहरा बन गया है:

  • जो ज्ञानवान था, पर वर्ण व्यवस्था का विरोधी भी,

  • जिसे ‘असुर’ कहा गया, पर जिसने शास्त्रों में महारत हासिल की,

  • जो शक्तिशाली था, पर ‘पवित्रता की परिभाषा’ से बाहर रखा गया।

दलित समाज में रावण सामाजिक विद्रोह और पहचान का प्रतीक बन चुका है — और चंद्रशेखर आज़ाद ने इस प्रतीक को नाम देकर ज़मीन पर उतारा।

धर्म के नाम पर ब्राह्मणवाद को चुनौती

रावण’ नाम अपनाना एक राजनीतिक स्टेटमेंट भी है। भारत में राजनीति धर्म से जुड़ी होती है, और धर्म अक्सर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार परिभाषित होता है।

चंद्रशेखर आज़ाद इस नाम के ज़रिए यह कहते हैं कि:

  • वह धार्मिक सत्ता को चुनौती देने को तैयार हैं,

  • वह पौराणिक चरित्रों की पुनर्व्याख्या करना चाहते हैं,

  • और वो चाहते हैं कि इतिहास को दलित नज़रिए से पढ़ा और समझा जाए।

    धर्म के नाम पर ब्राह्मणवाद को चुनौती

    रावण’ नाम अपनाना एक राजनीतिक स्टेटमेंट भी है। भारत में राजनीति धर्म से जुड़ी होती है, और धर्म अक्सर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुसार परिभाषित होता है।

    चंद्रशेखर आज़ाद इस नाम के ज़रिए यह कहते हैं कि:

    • वह धार्मिक सत्ता को चुनौती देने को तैयार हैं,

    • वह पौराणिक चरित्रों की पुनर्व्याख्या करना चाहते हैं,

    • और वो चाहते हैं कि इतिहास को दलित नज़रिए से पढ़ा और समझा जाए।

    विरोधियों की प्रतिक्रिया और जन समर्थन

    चंद्रशेखर को ‘रावण’ कहने पर उन्हें कई बार हिंदू विरोधी, राष्ट्र विरोधी, और अपराधी मानसिकता का नेता बताया गया। लेकिन इसके बावजूद, दलित और पिछड़े वर्ग के कई युवा उन्हें ‘हमारा रावण’ कहकर सम्मान देते हैं।

    सोशल मीडिया पर #OurRavan #JaiBhimRavan जैसे ट्रेंड्स ये दिखाते हैं कि ये नाम कई लोगों के लिए गर्व का विषय बन चुका है।

    सोशल मीडिया और डिजिटल ब्रांडिंग में ‘रावण’ का असर

    आज की राजनीति में ब्रांडिंग बहुत ज़रूरी है।
    चंद्रशेखर ने अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़कर अपनी पहचान को एक ब्रांड बना लिया है:

    • Instagram पर “Ravan Bhai” नाम से फैन पेज़

    • YouTube वीडियोस में “भीम रावण” के नारे

    • ट्विटर पर ‘जय भीम रावण’ का ट्रेंड

    इस ब्रांडिंग ने उन्हें युवा वर्ग और डिजिटल दर्शकों के बीच लोकप्रिय बना दिया है।

    सांस्कृतिक पुनर्लेखन की एक मिसाल

    चंद्रशेखर आज़ाद का ‘रावण’ नाम चुनना दरअसल एक सांस्कृतिक पुनर्लेखन (Cultural Rewriting) है।
    वो ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जो चरित्र अब तक बुराई के प्रतीक थे, उन्हें नए दृष्टिकोण से देखना ज़रूरी है

    यह कदम सामाजिक बदलाव की दिशा में एक सांस्कृतिक आंदोलन भी बनता जा रहा है।

    एक नाम, एक क्रांति

    चंद्रशेखर आज़ाद ने जब अपने नाम के साथ ‘रावण’ जोड़ा, तो यह सिर्फ एक पौराणिक चरित्र को अपनाना नहीं था — यह एक संकल्प था, एक चुनौती थी, और एक विचारधारा थी।

    उन्होंने एक ऐसा नाम चुना जो सदियों से विवादित रहा है, और उसे वंचितों की आवाज़ बना दिया।
    आज जब वो ‘रावण’ के नाम से मंच पर चढ़ते हैं, तो हर नारा, हर भाषण, हर शब्द — दलित संघर्ष की गूंज बन जाता है।

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